अम्बाह से अजय जैन
अम्बाह। देश में हर धर्म में साधु संतों के आहार(भोजन) करने के अलग अलग नियम होते हैं, वहीं जैन संत की आहारचर्या भी अंचभित करने वाली है। जैन साधु संत की आहारचर्या इतनी कठिन होती है कि विधि नहीं मिलने पर साधु संत को कई दिनों तक भूखा भी रहना पड़ता है। दरअसल, इस दिनों चातुर्मास को लेकर अंबाह नगर में जैन आचार्य विनम्र सागर ग्यारह साधू संतो के साथ विराजमान है शहर में कई श्रद्धालुओं को जैन संत की आहारचर्या के बारे में जानकारी नहीं है। ऐसे में खास तौर पर भास्कर ने आहारचर्या से जुड़ी जानकारी जुटाई है दरअसल, जैन मुनि 24 घंटे में सिर्फ एक बार भोजन और पानी पीते हैं, इसका भी अपना तय समय है। सूर्योदय होने के पांच से छह घंटे में आहार चर्या हो जाती है। इनकी आहारचर्या भी इनकी साधना का अहम हिस्सा है। यह स्वाद के लिए भोजन नहीं करते हैं। यह धर्म साधना के लिए भोजन करते हैं। यह साधना आम इंसान के लिए काफी कठिन होती है। यदि उन्हें निश्चित धारणा नहीं मिलती है, तो वैसे ही वापस लौट जाते हैं।
साधु की भोजन के प्रति आसक्ति दूर होती है
जैन साधु की आहारचर्या को सिंहवृत्ति कहते हैं। साधु एक ही स्थान पर खड़े होकर दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बनाते हैं, उसी में भोजन करते हैं। यदि अंजुली में भोजन के साथ चींटी, बाल, कोई अपवित्र पदार्थ या अन्य कोई जीव आ जाए तो उसी समय भोजन लेना बंद कर देते हैं। अपने हाथ छोड़ देते हैं। उसके बाद पानी भी नहीं पीते है। इस विधि से भोजन करने से साधु की भोजन के प्रति आसक्ति दूर होती है। आहार से पूर्व साधू आहार देने वालो से कुछ न कुछ त्याग करवाते हैं। किसी को रात्रि भोजन का त्याग करवाते हैं तो किसी को नित्य देव दर्शन का संकल्प दिलवाते हैं। किसी को जमीकंद त्याग का संकल्प दिलवाते हैं। उसी के बाद श्रावक के हाथों से आहार ग्रहण करते हैं।
विधि लेकर विशेष मुद्रा में निकलते हैं संत
आचार्य विन्रम सागर सहित अन्य जैन साधु संत जब आहार (भोजन) के लिए निकलते हैं तो जिन प्रतिमा के दर्शन कर विधि (नियम) लेकर निकलते हैं। विशेष मुद्रा लिए निकलते है। पडग़ाहन में श्रद्धालुओं द्वारा शब्दों का उच्चारण किया जाता है। उस दौरान श्रद्धालु मतलब श्रावक के पास नारियल, कलश, लौंग,फल होने का नियम लिया जाता है। नियम के अनुसार ये वस्तु नहीं दिखने पर साधू बिना आहार लिए वापस आ जाते हैं। उसके बाद दूसरे दिन फिर वहीं नियम के साथ आहार के लिए वापस निकलते है। यदि नियम फिर भी नहीं मिलता है तो आहार के लिए घर में प्रवेश नहीं करते हैं। फिर अगले दिन का इंतजार किया जाता है। जैन साधु संत का आहार किसके यहां पर होगा, यह पहले से तय नहीं होता है। साधु को देखकर देख कर चौके वाले अपने घर से निकल आते हैं, सभी श्रावक आहार जल शुद्ध है का उच्चारण पंक्तिबद्ध करते हैं। यदि विधि मिल जाती है श्रावक की ओर से तीन प्रदक्षिणा दी जाती है।
दिन में एक बार किया जाता है आहार
मुनि विज्ञ सागर महाराज कहते हैं कि दिन में एक बार आहार करने के पीछे कई कारण है। शरीर से ममत्व भाव को कम करना। धर्म साधना करते समय आलस्य ना आ जाए। इसलिए भोजन को शुद्धता के साथ बनाया जाना बहुत जरूरी होता है। जैन संत स्वाद के लिए भोजन नही करते है। ये धर्म साधना के लिए भोजन करते है।




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