आज से लगभग 30 बरस पहले राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित एक फिल्म आई थी नाम था दामिनी फिल्म हिट हुई थी लेकिन उसका एक डायलॉग जो एक वकील के रूप में सनी देओल अदालत में कहता है फिल्म से भी ज्यादा मकबूल हुआ था जिसमें वो अदालत में चिल्ला चिल्ला का कहता है तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख मिलती रही लेकिन इंसाफ नहीं मिला माई लॉर्ड। खैर वो तो फिल्म थी लेकिन मध्य प्रदेश में भाजपा के उन नेताओं को जो बेचारे निगमों, मंडलों, प्राधिकरणों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनने की राह देख रहे हैं उन्हें भी इसी तरह तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, मिलती जा रही है लेकिन कुर्सी नहीं मिल रही है सीएम साहब। प्रदेश में विधानसभा चुनाव खत्म हुए 8 महीने लगभग बीत चुके हैं, जो नेता शिवराज सिंह चौहान के जमाने में अध्यक्ष उपाध्यक्ष बनाए गए थे उनकी कुर्सी वर्तमान सीएम मोहन यादव ने एक झटके में खींच ली। सारे निगमों मंडलों प्राधिकरणों के अध्यक्षों, उपाध्यक्षों को हटाकर इनकी बागडोर अफसरों के हाथों में सौंप दीऔर यह बताया गया कि बहुत जल्दी अब दूसरे लोगों को इसमें अवसर दिया जाएगा। तब से भारतीय जनता पार्टी के तमाम लीडरान इसी आशा में डॉक्टर मोहन यादव की तरफ आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं कि काश कभी उनकी तरफ भी नजरे इनायत हो जाएं। तमाम मंडल, प्राधिकरण, निगम अपने-अपने मुखिया की राह तक रहे हैं कि कोई तो उनकी सुध ले ले, लेकिन डॉक्टर साहब है तो किसी को दवाई देने तैयार नहीं। कुर्सी की बीमारी से तमाम नेता त्रस्त हो गए हैं कि कब उन्हें कुर्सी पर बैठने का मौका मिल जाए, लेकिन 8 महीने में न जाने कितनी बार उन्हें तारीख मिल चुकी है कि बस अब वक्त आ गया है जब उन्हें किसी न किसी निगम में मंडल में या प्राधिकरण में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बना दिया जाएगा, लेकिन जैसे कल कभी नहीं आता वैसे ही वो तारीख सामने नहीं आ रही है जिस तारीख में इन तमाम नेताओं को एडजस्ट किया जाएगा। इच्छुक नेता दिल्ली दरबार की भी परिक्रमा करने में जुटे हैं कि भोपाल में सेटिंग ना भी हो पाए तो सीधा डायरेक्ट दिल्ली से मामला सेट कर लिया जाए, लेकिन बेचारों की आंखें पथरा गई हैं ,अच्छी खबर सुनने के लिए कान तरस गए हैं, कुर्सी पर बैठने के लिए शरीर तड़प रहा है लेकिन दूर-दूर तक कोई रास्ता नजर आता नहीं दिखता। अब एक खबर आई है कि तीन महीने बाद इस मसले पर विचार किया जाएगा , यानी कुल मिलाकर इन तीन महीनों तक लोगों का कुछ नहीं हो पाएगा पर तीन महीने बाद फिर कौन सी नई तारीख मिलती है ये कहना बड़ा मुश्किल है। लोग बाग कहते हैं इंतजार का फल बड़ा मीठा होता है लेकिन यहां तो इंतजार करते-करते ,बड़े नेताओं के चक्कर काटते काटते चप्पलें घिस गई हैं लेकिन वो परमानेंट तारीख अभी तक नहीं मिल पाई है जिस तारीख में इनके अपॉइंटमेंट हो पाएंगे।
ये दिन आ गए अब इनके
आईएएस अफसरों के बारे
में ये कहा जाता है कि पचास हजार में से एक व्यक्ति आईएएस बन पाता है और एक बार आईएएस
बन जाता है तो फिर उसकी हैसियत राजा जैसी हो जाती है। नेताओं का क्या है 5 साल बाद
क्या पता नहीं कुर्सी मिलती है कि नहीं मिलती लेकिन आईएएस तो पैंतीस साल राज करता है,
सारे अधिकार उसके हाथों में होते हैं। कलेक्टर जिले का राजा होता है तो मुख्य सचिव
पूरे प्रदेश का। कौन सी योजनाएं चलाना है, किसको ठेका देना है, किसको ओब्लाइज करना
है, किसको परेशान करना है ये सब वही तय करते हैं लेकिन मध्य प्रदेश के आईएएस अफसरों
की हालत तो देखो, ऐसी दुर्दशा होगी ये कभी उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा। जब
से प्रदेश में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ी है उसके बाद से मुख्यमंत्री डॉक्टर
मोहन यादव ने एक आदेश जारी करके कुत्तों की निगरानी की जिम्मेदारी पांच बड़े आईएएस
अफसरों को सौंप दी है कि वे देखें कि इन कुत्तों की जनसंख्या में कैसे कमी आ सकती है,
कुत्तों के काटने की घटनाएं कैसे कम हो सकती है, अब बेचारे अपना सारा काम धाम छोड़कर
इसी शोध में लगे हैं कि कुत्तों से कैसे निपटा जाए। अभी वे कुत्तों से निपटने की योजना
बना ही रहे थे कि एक और आदेश आ गया , तमाम जिलों के कलेक्टर नेशनल हाईवे और मुख्य मार्गो
से गायों को हटाए। कलेक्टरों को लग रहा है कि कुत्ते और गाय का आदेश तो आ ही गया है
ना कहो अब सांडों को सड़कों से खदेड़ने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर सौंप दी
जाए। क्या सोचकर आए थे, कितनी मेहनत की थी, आईएएस बनने के लिए, सोचा था जिंदगी भर राज
करेंगे लेकिन यहां तो कुत्ता, बिलैया, गैया भगाने की जिम्मेदारी मिल गई है। पता लगा
है कि तमाम कलेक्टर गांव के चरवाहों से ट्रेनिंग ले रहे हैं कि इन गायों को कैसे सड़कों
से हांका जाए। अपना तो सरकार से एक निवेदन है की मसूरी में जो आईएएस अफसरों की ट्रेनिंग
होती है उसमें एक पीरियड कुत्तों, गायों, सांडों को भगाने का भी शामिल किया कर लिया
जाए ताकि जब ऐसे आदेश हो तो उन्हें ज्यादा श्रम ना करना पड़ेl
फिर वही रात में रुकने
की बात
कई बरस हो गए हमको
ये सुनते और पढ़ते, जितने भी सीएम आते हैं वो अपने कलेक्टरों से कहते हैं कि एक रात
जरूर गांव में गुजारें ,लेकिन अपने को पता है कि आज तक किसी कलेक्टर ने गांव में रात
नहीं गुजारी होगी, और कौन होगा ऐसा जो वहां रात में खटिया में सो कर मच्छरों से कटवाए,
सुबह चार बजे मुर्गे की बांग पर उठना पड़ जाएगा, ना पंखा होगा ना एसी होगा। अब प्रदेश
के मुखिया ने अफसरों को छोड़कर मंत्रियों को आदेश दे दिया है कि वे जिस जिले के प्रभार
में है वहां कम से कम एक रात जरूर गुजारें। अपने को तो आज तक समझ में नहीं आया कि एक
रात गुजारने से ऐसा क्या उखड़ने वाला है। अरे भाई दिन गुजरो तो समझ में भी आता है कि
अफसर मिल जाएंगे, कर्मचारी मिल जाएंगे, लोग मिलेंगे, समस्याएं सामने आएंगी। रात में
ऐसा क्या होने वाला है। जिले में अब यही होगा कि जो मंत्री जी आएंगे बेहतरीन एयर कंडीशन
सर्किट हाउस में रात में डिनर लेंगे, सारे जिले के अफसर उनकी सेवा में जुटे रहेंगे
,दस ग्यारह बजे बेहतरीन गद्देदार पलंग में लेट कर निद्रा देवी को आमंत्रित करेंगे और
फिर कुछ देर में उनके खर्राटे सर्किट हाउस की दीवारों से टकराने लगेंगे , सुबह उठकर
फिर राजधानी की तरफ बढ़ लेंगे कहने को हो जाएगा कि हमने रात उस जिले में कुछ गुजार
दी है यानी हर लगे ना फिटकरी रंग चोखा हो पता नहीं है रात गुजारने वाली स्कीम किसने
बनाई थी जिसने भी बनाई है उस पर आज तक किसी कलेक्टर ने अमल नहीं किया और अपने को तो
लगता है कि जब अफसरों ने सीएम की बात नहीं मानी हो तो फिर मंत्रियों को भला कौन मजबूर
कर सकता है कि वे अपने प्रभार वाले जिले में रात गुजारें।
सुपर हिट ऑफ़ द वीक
मैं आपको कैसी लगती
हूं श्रीमती जी ने श्रीमान जी से पूछा
बहुत ज्यादा अच्छी
श्रीमान जी ने कहा
फिर भी कितनी ज्यादा,
ये तो बताओ
इतनी ज्यादा कि लगता
है तुम्हारी जैसी दो तीन और ले आऊं श्रीमान जी ने उत्तर दिया।
लेखक- चैतन्य भट्ट


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