अजय कुमार बियानी, इंजीनियर और स्वतंत्र लेखक
देश में स्वच्छता की मिसाल बन चुके इंदौर ने यह साबित किया है कि यदि नागरिक और प्रशासन मिलकर ठान लें तो किसी भी शहर की पहचान बदली जा सकती है। वर्षों से लगातार स्वच्छता के क्षेत्र में अग्रणी रहने वाला यह शहर अनुशासन, जागरूकता और नागरिक भागीदारी का प्रतीक बन चुका है। सुबह‑सुबह कचरा वाहन की धुन सुनते ही लोग घरों से निकलकर कचरा अलग‑अलग डिब्बों में डालते हैं। यह वही शहर है जिसने सफाई को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति बना लिया है।
लेकिन इसी शहर की सड़कों पर एक विरोधाभासी तस्वीर भी दिखाई देती है। चौराहों पर जैसे ही लाल बत्ती जलती है, कई वाहन चालक मानो उसके अर्थ को ही बदल देते हैं। जहां नियम कहता है कि वाहन रुकना चाहिए, वहीं कुछ लोग रफ्तार बढ़ा देते हैं। ऐसा लगता है जैसे लाल रंग का संकेत कई लोगों के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का निमंत्रण बन गया हो।
यह स्थिति किसी एक चौराहे तक सीमित नहीं है। पुराने बाजारों की गलियों से लेकर नई चौड़ी सड़कों तक, कई जगह यह प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है। लाल बत्ती का अर्थ रुकना है, यह सड़क सुरक्षा का सबसे मूलभूत नियम है। इसके बावजूद अनेक लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। कुछ लोग अपनी जल्दबाजी का हवाला देते हैं, तो कुछ इसे रोजमर्रा की आदत बना चुके हैं।
समस्या केवल नियमों के उल्लंघन की नहीं है, बल्कि सोच की भी है। जब कोई व्यक्ति चौराहे पर रुकने के बजाय आगे बढ़ने का निर्णय लेता है, तो वह केवल कानून को चुनौती नहीं देता, बल्कि दूसरों की सुरक्षा को भी जोखिम में डाल देता है। सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति किसी परिवार का सदस्य होता है। एक क्षण की असावधानी किसी घर की खुशियां छीन सकती है।
विडंबना यह है कि जिस शहर ने स्वच्छता को अपनी पहचान बनाया, वहीं सड़क अनुशासन के मामले में कभी‑कभी अधीरता दिखाई देती है। सड़कें साफ हैं, संकेत स्पष्ट हैं और व्यवस्था भी मौजूद है, लेकिन यदि नागरिकों का व्यवहार नियमों के प्रति उदासीन हो जाए तो सारी व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है।
प्रशासन ने इस समस्या को रोकने के लिए कई प्रयास किए हैं। चौराहों पर निगरानी बढ़ाई गई है और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक दंड भी लगाया जा रहा है। फिर भी यदि स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता, तो यह संकेत है कि केवल दंड से समाधान संभव नहीं है। इसके लिए नागरिक चेतना का जागना भी उतना ही आवश्यक है।
सड़क अनुशासन किसी दंड के भय से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की भावना से आता है। यदि हम यह समझ लें कि चौराहे पर कुछ क्षण रुकना समय की बर्बादी नहीं, बल्कि सुरक्षा का निवेश है, तो स्थिति बदल सकती है। सभ्यता केवल ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं बनती, बल्कि नागरिकों के व्यवहार से बनती है।
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में जो उपलब्धि हासिल की है, वह इस बात का प्रमाण है कि जब पूरा शहर किसी लक्ष्य के लिए एकजुट होता है तो परिणाम असाधारण होते हैं। यदि इसी भावना को सड़क अनुशासन के क्षेत्र में भी अपनाया जाए, तो दुर्घटनाओं की संख्या कम की जा सकती है और शहर की पहचान और मजबूत हो सकती है।
आखिरकार, शहर की प्रतिष्ठा उसके नागरिकों से ही बनती है। यदि हम अपने शहर को सचमुच आदर्श बनाना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि लाल बत्ती कोई विकल्प नहीं, बल्कि स्पष्ट आदेश है। यह हमें केवल रुकने के लिए नहीं कहती, बल्कि यह संदेश देती है कि थोड़ी‑सी सावधानी किसी बड़े हादसे को टाल सकती है।
अगली बार जब चौराहे पर लाल बत्ती जले और पीछे से अधीरता का शोर सुनाई दे, तब भी शांत रहकर रुकना ही जिम्मेदार नागरिक का परिचय है। क्योंकि सच्ची प्रगति वही है जिसमें गति के साथ‑साथ सुरक्षा और अनुशासन भी शामिल हों।
तभी पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकेगा—
अरे ओ भिया, इंदौर में लाल बत्ती आज भी लाल ही होती है। 🚦📰



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