सिंह या बाघ—मां दुर्गा की सवारी में निहित आस्था, परंपरा और शास्त्र का गूढ़ संदेश


अजय कुमार बियानी, इंजीनियर और स्वतंत्र लेखक

नवरात्रि के पावन पर्व में जब पूरे देश में मां दुर्गा की आराधना होती है, तब एक प्रश्न अक्सर जनमानस के मन में उठता है—मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ? यह प्रश्न केवल जिज्ञासा भर नहीं, बल्कि हमारी धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और विविध सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा एक गहन विषय है। वास्तव में, मां दुर्गा के स्वरूप जितने विविध हैं, उनकी सवारी के रूप भी उतने ही व्यापक और प्रतीकात्मक हैं।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मां दुर्गा की मूल सवारी सिंह मानी गई है। मार्कंडेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती के प्रसंग में जब देवी ने महिषासुर का वध किया, तब वे सिंह पर आरूढ़ थीं। सिंह को शक्ति, साहस, पराक्रम और राजसत्ता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि देवी को “सिंहवाहिनी” कहा गया और लोकभाषा में यह रूप “शेरावाली माता” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां यह समझना आवश्यक है कि सिंह और शेर मूलतः एक ही अर्थ के भिन्न रूप हैं, जो भाषा के अनुसार बदलते रहे हैं।

दूसरी ओर, देश के कई क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वी और दक्षिणी भारत में देवी को बाघ पर सवार दिखाया जाता है। यह कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का प्रभाव है। जिन क्षेत्रों में बाघ प्रमुख रूप से पाए जाते थे, वहां के लोगों ने उसी पशु को देवी की सवारी के रूप में स्वीकार किया। बाघ भी उतना ही शक्तिशाली, निर्भीक और प्रभावशाली माना जाता है जितना सिंह। इस प्रकार, दोनों ही रूप देवी की शक्ति के प्रतीक हैं।

मां दुर्गा को “शेरावाली” कहे जाने के पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि जब माता पार्वती कठोर तपस्या कर रही थीं, तब एक भूखा सिंह उन्हें अपना आहार बनाने के उद्देश्य से वहां पहुंचा। किंतु माता के समीप आते ही वह शांत होकर बैठ गया और उनकी तपस्या समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगा। वर्षों तक वह सिंह बिना हिले-डुले, भूखा-प्यासा वहीं बैठा रहा। जब माता पार्वती की तपस्या पूर्ण हुई, तो उन्होंने उस सिंह की धैर्यपूर्ण साधना को देखकर उसे अपना वाहन बना लिया। इस प्रकार सिंह न केवल शक्ति, बल्कि समर्पण और धैर्य का भी प्रतीक बन गया।

एक अन्य पौराणिक प्रसंग में यह उल्लेख मिलता है कि देवताओं और असुरों के युद्ध के समय, माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने एक असुर का वध किया। उस असुर ने अंतिम समय में क्षमा याचना की, जिससे प्रसन्न होकर उसे सिंह का रूप देकर माता की सेवा में नियुक्त किया गया। यह कथा भी इस बात को पुष्ट करती है कि सिंह केवल एक पशु नहीं, बल्कि देवी की शक्ति का अभिन्न अंग है।

मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में उनके वाहन भी भिन्न-भिन्न बताए गए हैं। नवरात्रि में पूजित नवदुर्गा के रूपों में कहीं सिंह, कहीं बाघ, तो कहीं वृषभ, गधा अथवा अन्य वाहन का उल्लेख मिलता है। यह विविधता इस तथ्य को दर्शाती है कि देवी किसी एक रूप में सीमित नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण सृष्टि की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है।

इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में विभिन्न क्षेत्रों में सिंह और बाघ दोनों ही पाए जाते थे। इस कारण अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने अपने परिवेश के अनुसार देवी की सवारी का स्वरूप निर्धारित किया। समय के साथ ये सभी रूप प्रचलित हो गए और आज भी समान रूप से स्वीकार किए जाते हैं। यह भारतीय संस्कृति की उदारता और समावेशी दृष्टिकोण का प्रतीक है, जहां विविधता को विरोध नहीं, बल्कि विशेषता माना जाता है।

वास्तव में, मां दुर्गा की सवारी को लेकर कोई विरोधाभास नहीं है। सिंह और बाघ दोनों ही उनकी असीम शक्ति, साहस और रक्षक स्वरूप के प्रतीक हैं। ये हमें यह संदेश देते हैं कि जीवन में कठिनाइयों का सामना निर्भीक होकर करना चाहिए और अपने भीतर की शक्ति को पहचानना चाहिए। देवी का वाहन केवल एक दृश्य प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक संकेत है, जो मनुष्य को आत्मबल और विश्वास प्रदान करता है।

आज के समय में जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, मां दुर्गा की यह शिक्षाएं और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। उनकी सवारी चाहे सिंह हो या बाघ, दोनों ही हमें यह प्रेरणा देते हैं कि साहस, धैर्य और विश्वास के साथ हम हर संकट पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। नवरात्रि का पर्व इसी आत्मशक्ति को जागृत करने का अवसर है।

अंततः, यह कहना अधिक उचित होगा कि मां दुर्गा की सवारी का प्रश्न केवल “सिंह या बाघ” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी व्यापक शक्ति और सर्वव्यापकता का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में देवी के इन विविध रूपों का सम्मान ही हमारी सबसे बड़ी विशेषता है, जो हमें एकता में अनेकता का सच्चा अर्थ समझाती है।

Post a Comment

0 Comments