अजय कुमार बियानी, सेवानिवृत्त इंजीनियर
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, लेकिन इस चमकती तस्वीर के नीचे जल संकट की गंभीर चुनौती तेजी से उभर रही है। भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है, वर्षा सामान्य से कम हो रही है और पानी के लिए बोरवेल पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ये संकेत बताते हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पानी जुटाना पहले से कहीं अधिक कठिन और महँगा हो सकता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से प्राप्त उपग्रह चित्रों के आधार पर एसजीएसआईटीएस में भारतीय सुदूर संवेदन सोसायटी द्वारा किए गए अध्ययन में भूजल की उपलब्धता में चिंताजनक गिरावट सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2019 में जहाँ लगभग 350 से 400 फीट की गहराई पर पानी मिल जाता था, वहीं वर्ष 2025 तक यह गहराई बढ़कर करीब 750 फीट हो गई। वर्ष 2026 में कुछ क्षेत्रों में 800 फीट तक पानी मिलना भी कठिन बताया गया, जबकि कुछ स्थानों पर 1,200 फीट से अधिक गहराई तक पानी की तलाश करनी पड़ रही है। ये आँकड़े भूजल की वैज्ञानिक निगरानी और जल संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित करते हैं।
समस्या केवल पानी के अधिक गहराई में चले जाने की नहीं है। जब नगर निगम की जलापूर्ति पर्याप्त नहीं होती या सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुँचती, तो लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बोरवेल खुदवाने लगते हैं। एक परिवार के लिए बोरवेल अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन जब पूरा क्षेत्र भूजल का अत्यधिक दोहन करने लगे, तो संकट सबके लिए गहरा हो जाता है। पानी निकालने की होड़ अंततः उसी संसाधन को तेजी से समाप्त करती है, जिस पर शहर की बड़ी आबादी निर्भर है।
कमजोर मानसून ने भी इंदौर की जल सुरक्षा पर दबाव बढ़ाया है। गर्मियों में संभावित जल संकट से निपटने के लिए नगर निगम अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग की दिशा में कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। इनमें प्रतिदिन कुल तीन करोड़ लीटर क्षमता वाले चार उन्नत अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव शामिल है। इन संयंत्रों से शोधित पानी का उपयोग बागवानी, सड़कों की धुलाई, निर्माण कार्य, सीवर सफाई और अन्य गैर-पेय जरूरतों में किया जा सकेगा। इससे स्वच्छ जल को पीने और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए बचाने में मदद मिल सकती है।
हालाँकि, केवल नए संयंत्रों और बड़ी परियोजनाओं से शहर का जल भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। वर्षा जल संचयन को भवन निर्माण की अनुमति हासिल करने की औपचारिकता से आगे बढ़ाकर एक प्रभावी और नियमित व्यवस्था बनाना होगा। छतों पर गिरने वाले वर्षा जल को उचित संरचनाओं के माध्यम से जमीन में पहुँचाया जाए, ताकि भूजल का पुनर्भरण हो सके। तालाबों, झीलों, खुले स्थानों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को अतिक्रमण तथा प्रदूषण से बचाना भी जरूरी है। बारिश का पानी तेजी से नालों में बहकर निकल जाए और गर्मियों में शहर पानी के लिए परेशान हो, तो यह जल प्रबंधन की गंभीर चुनौती है।
नगर निगम को जलापूर्ति की पाइपलाइनों में रिसाव रोकने, समय पर रखरखाव करने और सार्वजनिक जल वितरण व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बनाने पर भी ध्यान देना चाहिए। भूजल के दोहन की निगरानी मजबूत होनी चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों के जलस्तर, बोरवेल के उपयोग और वर्षा जल से होने वाले पुनर्भरण के आँकड़े पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक किए जाएँ। वैज्ञानिक अध्ययनों को नागरिकों और विशेषज्ञों के लिए उपलब्ध कराने से संकट की वास्तविक स्थिति समझने और किए जा रहे प्रयासों की प्रगति का आकलन करने में मदद मिलेगी।
जल संरक्षण केवल सरकार या नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक की छोटी-छोटी आदतें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं। टपकते नल ठीक करवाना, जरूरत के अनुसार पानी का उपयोग करना, वाहन और आँगन धोने में अनावश्यक पानी न बहाना तथा वर्षा जल संचयन की व्यवस्था को नियमित रूप से चालू रखना जरूरी है। आवासीय समितियाँ अपने जल उपभोग का आकलन कर सकती हैं, बोरवेल के जलस्तर पर निगरानी रख सकती हैं और उपयुक्त व्यवस्था के तहत शोधित अपशिष्ट जल का उपयोग बागवानी तथा सफाई में कर सकती हैं।
इंदौर ने जनभागीदारी और निरंतर नागरिक प्रयासों से स्वच्छता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। अब जल संरक्षण के लिए भी उसी सामूहिक संकल्प की जरूरत है। स्वच्छता शहर के पर्यावरण को बेहतर बनाती है, जबकि जल संरक्षण उसके भविष्य को सुरक्षित करता है।
आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम जल संकट को गंभीर रूप लेने से पहले अपनी आदतों, योजनाओं और प्राथमिकताओं में जरूरी बदलाव कर पाएँगे? पानी की हर बूँद को बचाना अब केवल अच्छी आदत नहीं, बल्कि शहर की जरूरत है। क्योंकि पाताल में उतरता पानी केवल भूजल स्तर की गिरावट नहीं, इंदौर के भविष्य के लिए चेतावनी है।




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